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वैशाली डायरी

Breaking News

बिदूपुर:स्थानीय बुद्धिजीवियों,राजनीतिक दल कर रहे समझौते की प्रयास। बिदूपुर:अपराध की योजना बना रहे दो अपराधी गिरफ्तार। जनता-जनार्दन के स्वास्थ्य लाभ के लिए आयूर्वेद एवं प्राकृतिक चिकित्सा का केंद्र खुला। पितृदेव शिरोमणि व ज्योतिष वास्तु आयुर्वेद भूषण सम्मान मिला! प्रोफेसर अनिरुद्ध प्रसाद उर्फ एपी दास के असामयिक निधन पर समाज को अद्वितीय क्षति !

परिचय

श्री राम ने लक्ष्मण से कहा था - "अपि स्वर्णमयी लंका न रोचने लक्ष्मणः। जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसि।।"

अर्थात् हे लक्ष्मण मुझे सोने की लंका अच्छी नहीं लगती है माता और मातृभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर हैं।

लहरों से डरकर नौका पार नहीं होती, कोश्िश करने वालों की हार नहीं होती लहरों से डरकर नौका पार नहीं होती कोश्िश करने वालों की हार नहीं होती नन्ही चींटी जब दाना लेकर चलती है चढ़ती दीवारों पर, सौ बार फिसलती है मन का विश्वास रगों मे साहस भरता है चढ़कर गिरना, गिरकर चढ़ना न अखरता है आखिर उसकी मेहनत बेकार नहीं होती, कोशिश करने वालों की हार नहीं होती डुबकियां सिन्धु में गोताखोर लगाता है, जा जा कर खाली हाथ लौटकर आता है मिलते नहीं सहज ही मोती गहरे पानी में, बढ़ता दुगना उत्साह इसी हैरानी में. मुट्ठी उसकी खाली हर बार नहीं होती, कोश्िश करने वालों की हार नहीं होती असफलता एक चुनौती है, इसे स्वीकार करो क्या कमी रह गई, देखो और सुधार करो जब तक ना सफल हो, नींद चौन को त्यागो तुम, संघर्ष का मैदान छोड़कर मत भागो तुम. कुछ किए बिना ही जय जयकार नहीं होती, कोश्िश करने वालों की हार नहीं होती

महत्वपूर्ण संदेश :

यह रचना सोहनलाल द्विवेदी जी ने लिखकर एक ऐसा जीवन का लकीर खींच दिया, जिससे एक-एक बुद्धिजीवियों के लिए जीवनगाथा के रूप में स्थापित हो गया और मैंने अपने जीवन में इसकी एक-एक शब्दों को उतारने का निरंतर प्रयास करते आ रहा हूँ।

परिवार यह शब्द जीवन का सबसे बड़ा यथार्थ सत्य हैं। परिवार जीवन की सबसे पहली इकाई हैं और जीवन की सीख का पहला विद्यालय।
जैसे मृत्यु सत्य हैं वैसे ही कोई जन्म लेता हैं तो उसके माता-पिता के साथ एक परिवार मिलता हैं। उस परिवार का स्वरूप विभिन्न प्रकार का हो सकता हैं जैसे - संयुक्त परिवार, एकल परिवार। लेकिन संयुक्त परिवार में जो गुण होता हैं वह एकल परिवार में कभी नहीं हो सकता हैं। फिर भी आधुनिकता के साथ संयुक्त परिवार का टुटना निरंतर जारी हैं। जो किसी भी समाज के लिए हितकर ना कभी रहा है और ना ही कभी हो सकता हैं।

परिवार का स्वरूप एक जन्म लिए किसी के लिए उतना महत्वपूर्ण हैं कि वह धीरे-धीरे एक से तीन और दर्जनों रिश्तों के साथ बड़े होने लगात हैं। जो बहुत महत्वपूर्ण आधार हैं। वहीं सामाजिक जीवन में कदम बढ़ाने में बहुत ही मददगार होता हैं। वहीं सामाजिक जीवन का दायरा बढ़ाने के अवसर से ही निकल कर अपने राष्ट्र के प्रति जिम्मेवारियों को समझने का अवसर प्रदान कर जाता हैं। इस लिए परिवार का स्वरूप जो भी हो, पर परिवार हो यह महत्वपूर्ण हैं। वैसे ही जीवन की रफ्तारों के साथ यथार्थ जीवन जीने में माता-पिता का संस्कार बहुत मायने रखता हैं। वहीं इस संस्कार में संयुक्त परिवार की जगह माता-पिता की भूमिका ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता हैं। संयुक्त परिवार हो या सामाजिक जीवन उसमें बच्चों के विकास के लिए जिम्मेवारियाँ एक सीमित दायरों में ही हो जाता हैं, जिसका परिणाम बहुत बुरा तो नहीं होता हैं पर परिवार का संचालन करने वाले अपने पर पूर्णरूपेण निर्भर होना, अन्य परिवार के भाई, भतीजों जैसे रिश्तों के लिए सुरक्षित नहीं होता हैं। अतः संयुक्त परिवार सामाजिक एवं राष्ट्रीय एकता का सबसे सुंदर उदाहरण हैं, लेकिन उसमें निर्भरता या अभिभावक पर अपने बच्चों को समर्पित कर देना घातक हैं। संचालन एक अलग बात है, पर संस्कार परिवार से ज्यादा माता-पिता से मिला हुआ जीवन को नई-नई उँचाईयों पर ले जाने एवं भटकाव से बचाव का साधन बनकर साथ खड़ा होता हैं।

शिक्षा :-

प्राथमिक शिक्षा :
प्राथमिक विद्यालय, पटिल्ही, हाजीपुर, वैशाली

मध्यमिक शिक्षा :
गुरू वशिष्ठ विद्यायन, कचहरी रोड हाजीपुर, वैशाली राजकीयकृत उच्च विद्यालय, सेन्दुआरी, हाजीपुर, वैशाली

मैट्रिक :
बिहार विद्यालय परीक्षा समिति, पटना

इंटर :
बिहार इंटरमिडिएट शिक्षा समिति, पटना

स्नातक :
राजनीतिक शास्त्र राज नारायण कॉलेज, हाजीपुर, वैशाली (विश्वविद्यालय : बाबा साहेब भीमराव अम्बेदकर बिहार विश्वविद्यालय, मुजफ्फरपुर, बिहार)

पत्रकारिता :
पी जी, डिप्लोमा मास कम्युनिकेशन एवं जर्नलिज्म, पुणे

स्न्नातकोत्तर :
राजनीतिक शास्त्र (पत्राचार माध्यम) - जारी स्वामी विवेकानंद विश्वविद्यालय, सागर, मध्यप्रदेश



शिक्षण संस्थान :-

शिक्षण संस्थान
मास कम्यूनिकेशन एवं जर्नलिज्म, हाजीपुर

सह
कम्प्यूटर शिक्षा (सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट)

सामाजिक उत्थान :
संयोजक भारत नव निर्माण, भारत



कार्यकलाप :-

समाचार चैनल :
प्रधान संपादक ,
अहान न्यूज,भारत (वैशाली)

2 जून 2015 - हाजीपुर, वैशाली, बिहार, भारत

सालाना-सूचना सह दैनिक डायरी :
प्रधान संपादक ,
वैशाली डायरी,भारत (वैशाली)

25 दिसम्बर 2014 - हाजीपुर, वैशाली, बिहार, भारत

समाचार पत्रिका :
प्रधान संपादक,
वैशाली डायरी,भारत (वैशाली)

10 फ़रवरी 2020 - हाजीपुर, वैशाली, बिहार, भारत

कंपनी संचालन :
प्रबंधक सह चैनल हेड,
अहान न्यूज प्राईवेट लिमिटेड,भारत (वैशाली)

20 जून 2018 - हाजीपुर, वैशाली, बिहार, भारत

सामाजिक संस्थान:
अध्यक्ष,
तिरहुत शोध एवं विकास प्रातिष्ठान।,भारत (वैशाली)

2 सितम्बर 2020 -हाजीपुर, वैशाली, बिहार, भारत



महत्वपूर्ण नोट:-







तकनीकि शिक्षा कम्प्यूटर पर विभिन्न अत्याधुनिक तकनीकों के साथ लगातार आगे बढ़ रहे हैं।
बेव डिजाईन अपने संस्थानों के सभी बेवसाईटों का डिजाईन स्वयं से किया, उन अनुभवों के आधार पर जिससे मैं अपने पाठकों से सीधे जुड़ सके और पाठकों को कोई समस्या ना हो।
मातृभूमि मैं अपने जीवन में शिक्षा प्राप्त करने के बाद भारत के प्रमुख शहरों में रहकर देखा। वहीं अपनी मातृभूमि की तरफ लौटने का सही वक्त का इंतजार कर ही रहा था कि बिहार के प्रशासनिक तंत्र के गालियों ने मजबूतर कर दिया, कि वक्त कभी नहीं आता हैं। वहीं वक्त की रफ्तार को पकड़ने के लिए अपनी सालों की मेहनत से खड़ा किया गया दुनिया एक पल में ढाह दिया और आ गया अपने गृह जिला और गृह मुख्यालय हाजीपुर।
अपनी मातृभूमि और जन्मभूमि पर असंवैधानिक तत्वों के बढ़ते कोढ़ को जानने और समझने के लिए ही हाजीपुर से अपने जीवन का एक नया अध्याय का आरंभ किया। पत्रकारिता को सिसकते देखकर इसको नया जीवन देने का काम शुरू किया और आज कुछ कदम बढ़ाते हुए स्वयं का एक वजूद खड़ा कर लिया हैं। मेरी मातृभूमि जो लोकतंत्र की जननी के रूप में विश्व के पटल पर अपनी छाप बनाई रखी हैं, उस लोकतांत्रिक भूमि पर लोकतंत्र का एक अंश आज तक नहीं देख पाया हूँ।
भारतीय संविधान की उद्देशिका को 2013 से सिसकते और रौंदते देख रहा हूँ।
आज लगभग 8 सालों के सफ़र में बिहार का लगभग 3 बार दौड़ कर यह देखा कि बिहार की उन्नति में अगर कोई बाधक हैं तो यहाँ कि राजनीतिक व्यवस्था। जो कि जातिवाद और धर्मवाद के नाम पर लगातार अकड़ रही हैं और इसकी जननी हैं भारतीय संविधान के कुछ ऐसी शक्ति जो सदनों में बैठे लोगों को देती हैं और वहीं सदनों में बैठे माननीय लोकतंत्र का चिरहरण करने में कोई कसर नहीं छोड़ रही हैं। भारतीय संविधान की उद्देशिक ने तो ना जाने अपने वजूद को कब का खो दिया हैं। इसलिए वैशाली लोकतंत्र की मातृभूमि से लोकतंत्र और भारतीय संविधान की उद्देशिका को जीवंत करने में अपनी जो भी भूमिका मैं और मेरी संस्थान निभा पाएगी वह कदम निरंतर बढ़ता चला जाएगा।
संघर्ष जीवन में निरंतरता रखने के लिए ही एक शब्द बना हैं संघर्ष। हम आप जिंदा हैं यह महसूस करने के लिए ही बोलना जरूरी है और संघर्ष करना जरूरी कदम हैं। इस कदम को मैनें उठाया वर्ष 16 जून 2005 में और निरंतर दिल्ली व एन सी आर (दिल्ली, नोएडा - उत्तर प्रदेश, गुड़गाँव, फरीदाबाद - हरियाणा), पूना और मुंबई (महाराष्ट्र), वापी (गुजरात) होते हुए अपनी मातृभूमि की तरफ मुखातिब हो चला आया।

यह सफ़र बहुत आसान नहीं था, पर बहुत सुंदर और कठिनाईयों भरी यादें हैं। कुछ सफ़र आज भी वहाँ पर अधुरे हैं, जिसे समय रहते हुए पूरा करने का प्रयास हैं। लाखों लोगों से सीधे रिश्ते बने और भातृ प्रेम और स्नेह ने मुझे जीवन की नई उड़ानों में भी सहयोगी रहे। मैं हमेशा अपने छोटे से छोटे सहयोगियों को याद रखता हूँ और उनके अधुरी कहानियों में हमेशा मैं जिंदा रहूँगा। मकसदों को पूरा करने का जूनून हमेशा रहा और उन्हें अपना सपना बनाकर हजारों लोगों ने सहयोगी भी बने और महत्वपूर्ण साथी भी। मैं हमेशा अपने से जुड़े एक-एक व्यक्ति को संजोग कर रखा हैं और समय और परिस्थितियों के अनुसार अधुरे और छूटे रिश्तों को मजबूती दे जरूर दूँगा।
राजनीतिक सोच़ भारत, हिन्दुस्तान, आर्यावर्त के नाम पर कोई समझौता नहीं। प्यार की ज्यादा जरूरत नहीं, जरूरत है इज्जत की, सम्मान की, भारत के गौरवमयी इतिहास को संयोग कर रखने की। हमें जरूरत है तो सिर्फ सम्मान की।

विचारों से बड़ा क्या हो सकता है? हमारी सोच से बड़ा क्या हो सकता है? हमारे ध्यान से बड़ा क्या हो सकता है? हमारे उद्देश्यों से बड़ा क्या हो सकता है? हमारे आदर्शों से बड़ा क्या हो सकता है? हमारी उड़ानों से बड़ा क्या हो सकता है? क्या उन्मुक्त गगन में उड़ने के लिए पंख जरूरी है? क्या जमीन पर चलने के लिए सहारे की जरूरत है? आखिर हमें क्या-क्या जरूरत है ये कौन बतायेगा, इस रंगभूमि पर? आप सभी का भारत नव निर्माण में स्वागत् करता हूँ। आपका मार्गदर्शन ही भारत नव निर्माण विजन 2020 है। भारत नव निर्माण एक सोच है, विचार है, समझ है, उत्थान है............ गाँव, पंचायत, प्रखण्ड, अनुमण्डल, नगर, जिला, प्रमण्डल, राज्य तब राष्ट्र निर्माण के साथ समाज निर्माण है। मैंने जो महसूस किया, उसी को व्यक्त कर रहा हूॅ। आप सभी के सहयोग से अपने जन्मभूमि, कर्मभूमि एवं राष्ट्भूमि के लिए कुछ करने की इच्छा जो लंबे समय से रही है उसे अब धरातल पर दो कदम बढ़ाने का समय आ गया है।

कहने को तो सारी ताकत विधायिका, कार्यपालिका एवं न्यायपालिका में निहित है, परंतु यथार्थ में कार्यपालिका में ही पूरा संविधान निहित है। संसद यानि लोकसभा में बैठे सांसदों पर ही पूरे देश की निगाहें टिकी हुई रहती है। लेकिन आजादी के इतने सालों बाद भी हम इन मुद्दों पर झगड़ने को तैयार होते हैं कि संविधान निर्माता कौन थे, परंतु आम आदमी के लिए बहुत ही कम बहस की जगह रह गई है हमारे संसद में। अगर हमारा संविधान पूर्णतः सही ही है तो आज तक हुए संशोधनों से हमारे निर्माताओं का अपमान ही माना जाना चाहिए। अगर नहीं तो ये समय के साथ बदलाव की आवश्यकता मांग ही है तो हमारे संविधान में पूर्णतः बदलाव होनी ही चाहिए यानि संविधान में संशोधन नहीं पूर्णतः बदलने की बात भी रखी जा सकती है। अब समय आ गया है कि हमारे संसद में बैठे सांसद देश की जनता के हिसाब से संविधान बनाये और संशोधन करें या पूर्ण संविधान बदलने पर विचार करें। संविधान से देश चलता है ना कि सांसद एवं जनप्रतिनिधियों से। हमारे देश के संचालक ये समझ बैठे है कि संचालन का आधार हमारे में ही निहित है। आम आदमी के सोच एवं उसकी विचारों से उनका कोई वास्ता नहीं होता हैं। आजादी के 70 वें साल में भी हम गुलाम हैं, देश के भ्रष्टाचारी समाज से, राजनेताओं से, भ्रष्ट प्रजा पालकों से, पग-पग पर, नस-नस में अत्याचार भरा पड़ा है। संविधान पूरे विश्व से लेकर बनाने का उद्देश्य यह था कि तत्कालीन परिवेश में देश को संचालन का मूल आधार मिल सके। लेकिन परिवर्तन या संशोधन की बहुत सारी या यूँ कहा जाये तो लगभग संविधान ही बदलना अब जरूरी महसूस हो रहा है। बार-बार बातें आती है कि बदलाव हो, सत्ता परिवर्तन हे, हर तरीके के हथकण्डे अपनाये जाते है भारतीय राजनीति में, जिससे नुकसान सिर्फ देशवासियों को है जो पूँजीपति नहीं हैं।
यही पर डा0 जगन्नाथ मिश्र ;पूर्व मुख्यमंत्री, बिहारद्ध जी कि पंक्ति से बहुत सारी बातें स्पष्ट हो जाती है कि - ‘‘संविधान की मंशा यहीं थी कि सरकारी प्रक्रिया सामाजिक-आर्थिक असमानताओं के उत्तरोत्तर घटाने रहने वाली हो। संवैधानिक और कानून चलाने वाली एजेंसियाँ जिन्हें हासिये के समुदायों के अधिकारों को सुरक्षा प्रदान करने का दायित्व सौंपा गया, यथेष्ठ सहायता प्रदान करने में असफल रहीं है।’’



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